दिल्ली विधान सभा अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता के संयोजन में दिल्ली में नौ दिवसीय राम कथा के साथ विश्व शांति मिशन का शुभारंभ
शांति, संवाद और नैतिक नेतृत्व का मंच है राम कथा: अध्यक्ष श्री गुप्ता
संयम और करुणा का मार्गदर्शन प्रदान करती है राम कथा: मोरारी बापू
हिंसा और असंतुलन से जूझती दुनिया में भगवान महावीर की शिक्षाएँ आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण: आचार्य लोकेश मुनि
राम कथा के माध्यम से भारत का सद्भाव और अहिंसा का संदेश गूंजता है
Sandhyamidday@नई दिल्ली@राम कथा केवल अतीत का आख्यान नहीं है; यह भविष्य के लिए नैतिक मार्गदर्शक और विश्व शांति का आह्वान है। ऐसे समय में जब विश्व युद्ध, हिंसा और गहरे विश्वास संकट का सामना कर रहा है, प्रभु श्रीराम का जीवन और आदर्श हमें यह स्मरण कराते हैं कि सच्चा नेतृत्व चरित्र, करुणा, संयम और नैतिक साहस में निहित होता है, यह विचार दिल्ली विधान सभा के माननीय अध्यक्ष विजेन्द्र गुप्ता ने आज व्यक्त किए। वे नई दिल्ली के भारत मंडपम में 17 से 25 जनवरी 2026 तक आयोजित नौ दिवसीय राम कथा के शुभारंभ अवसर पर संयोजक के रूप में सभा को संबोधित कर रहे थे। यह राम कथा प्रतिदिन प्रातः 10:00 बजे से आयोजित की जा रही है।
यह राम कथा आचार्य लोकेश मुनि जी द्वारा स्थापित अहिंसा विश्व भारती के तत्वावधान में, विश्व शांति केंद्र मिशन के अंतर्गत आयोजित की जा रही है। गुजरात के आध्यात्मिक गुरु एवं अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त राम कथा वाचक पूज्य मोरारी बापू कथा का प्रवचन कर रहे हैं। भारत के पूर्व राष्ट्रपति माननीय श्री रामनाथ कोविंद जी आयोजन समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य कर रहे हैं।
अपने संबोधन में अध्यक्ष ने कहा कि श्रीराम कथा ऐतिहासिक रूप से नैतिकता, भ्रातृत्व और मानवता के मूल्यों के प्रसार का सशक्त माध्यम रही है तथा यह भारत के सांस्कृतिक और आध्यात्मिक जीवन का अविभाज्य अंग है। उन्होंने कहा कि पूज्य मोरारी बापू ने दशकों से भारत और विश्व के विभिन्न देशों में राम कथा के माध्यम से मानवता का संदेश समाज के मूल में पहुँचाया है। उन्होंने यह भी कहा कि इस राम कथा को विश्व शांति केंद्र मिशन को समर्पित करना समाज, राष्ट्र और विश्व के कल्याण के प्रति एक सचेत और उद्देश्यपूर्ण प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
माननीय अध्यक्ष ने आगे कहा कि विश्व शांति केंद्र की परिकल्पना एक ऐसे नैतिक और आध्यात्मिक मंच के रूप में की गई है, जो विश्व के किसी भी हिस्से में युद्ध, हिंसा और संघर्ष की परिस्थितियों का समाधान संवाद, करुणा और अहिंसक सहभागिता के माध्यम से कर सके। उन्होंने विशेष रूप से इस बात को रेखांकित किया कि आचार्य लोकेश मुनि जी ने जैन धर्म की प्राचीन अहिंसा परंपरा को पुनर्जीवित करने और अहिंसा विश्व भारती तथा विश्व शांति केंद्र जैसे संस्थागत प्रयासों के माध्यम से उसे समकालीन प्रासंगिकता प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि जैन अहिंसा का यह पुनरुत्थान, प्रभु श्रीराम की करुणामय दर्शन-परंपरा के साथ मिलकर, आज के विखंडित वैश्विक वातावरण में शांति का एक विश्वसनीय और सार्थक मार्ग प्रस्तुत करता है। श्री गुप्ता ने इस बात पर बल दिया कि इस दृष्टि की सिद्धि ईमानदार और सामूहिक प्रयासों पर निर्भर करती है, क्योंकि मानवता और सम्पूर्ण विश्व का कल्याण शांति से अविभाज्य रूप से जुड़ा हुआ है।
गुप्ता ने कहा कि राम कथा भारत की जीवंत सभ्यता का प्रतीक है, जहाँ आध्यात्मिकता और शांति-निर्माण अलग-अलग नहीं, बल्कि एक-दूसरे में गहराई से जुड़े हुए हैं। उन्होंने कहा कि भारत मंडपम, जो भारत की सभ्यतागत विरासत पर आधारित वैश्विक पहचान का प्रतीक है, इस प्रकार के आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और नैतिक महत्व के कार्यक्रम के लिए एक उपयुक्त स्थल है। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन यह सिखाता है कि शक्ति सेवा के लिए होती है, त्याग ही वास्तविक शक्ति है और धर्म केवल कर्मकांड नहीं बल्कि नैतिक साहस है—ये सिद्धांत आज के सार्वजनिक जीवन में भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।
गुजरात के आध्यात्मिक गुरु एवं राम कथा वाचक पूज्य मोरारी बापू ने अपने संबोधन में कहा कि राम कथा मानवता के साथ एक जीवंत आध्यात्मिक संवाद है, जो करुणा, आत्मचिंतन और नैतिक उत्तरदायित्व को जागृत करने में सक्षम है। उन्होंने कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन सामंजस्य, संयम और सहानुभूति का शाश्वत मार्गदर्शन प्रदान करता है तथा संघर्ष और विभाजन से चिह्नित वर्तमान युग में राम कथा को विश्व शांति के मिशन से जोड़ना समयोचित और आवश्यक है।
अहिंसा विश्व भारती और विश्व शांति केंद्र के संस्थापक, पूज्य जैन संत आचार्य लोकेश मुनि जी ने अपने संबोधन में कहा कि सनातन धर्म किसी एक संप्रदाय का नाम नहीं, बल्कि एक शाश्वत और सार्वभौमिक सिद्धांत है, जो मानवता का मार्गदर्शन करता है। उन्होंने कहा कि सनातन चेतना वह एकीकृत सभ्यतागत शक्ति है, जो हिन्दू, जैन, सिख, बौद्ध और अन्य आस्था परंपराओं को करुणा, संयम और नैतिक जीवन मूल्यों पर आधारित साझा ढांचे में बाँधती है। जैन अहिंसा की समकालीन प्रासंगिकता पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि भगवान महावीर द्वारा प्रतिपादित अहिंसा, शांति, सद्भाव और संतुलन के सिद्धांत आज युद्ध, हिंसा और बढ़ते असंतुलन से जूझती दुनिया के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। उन्होंने कहा कि विश्व की अनेक समस्याओं का सार्थक समाधान महावीर के दर्शन में निहित है और विश्व शांति केंद्र की परिकल्पना इन्हीं शाश्वत मूल्यों को संवाद, करुणा और नैतिक उत्तरदायित्व के माध्यम से पुनर्जीवित और संस्थागत रूप देने के उद्देश्य से की गई है।

