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Wednesday, January 21, 2026
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नितिन नवीन ने दिये तेज रफ्तार के संकेत, लेकिन सियासी राह में चुनौतियां अनेक, पढ़िये क्या-क्या…!!

http://Nitin Naveen has given indications of a fast-paced approach, but there are many challenges on his political path. Read on to find out more…!!

Sandhyamidday@Newdelhi@ भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद पर नितिन नवीन ने काम शुरू कर दिया है। पहले ही दिन दक्षिण के राज्यों के लिए प्रभारी बनाकर  नवीन ने अपनी तेज वर्किंग का संकेत दिया है। नितिन नवीन के लिए राह आसान नहीं है, क्योंकि केवल 4 महीने बाद दक्षिण में चुनाव है। जबकि इसके बाद भी लगातार चुनाव का सिलसिला चलेगा। इसलिए हम बताते हैं, क्या रहेंगी चुनौतियां –

ये  प्रमुख चुनौतियां-

  1. स्वीकार्यता और बदलाव को लेकर भी चुनौती है। कम उम्र के कारण वरिष्ठ से संतुलन करना होगा। अपनी टीम बनाने बदलाव करने होंगे। अपनी स्वीकार्यता करानी होगी। पीएम नरेंद्र मोदी ने संगठन सर्वोपरि का संकेत देकर नवीन को मजबूत किया है।
  2. 2026 के विधानसभा और 2029 के लोकसभा चुनाव
    अब राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन के सामने इस साल पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, असम, पुदुचेरी और केरल में विधानसभा चुनाव होंगे. इनमें से किसी भी राज्य में बीजेपी के लिए लड़ाई आसान नहीं है. असली चुनौती 2029 के लोकसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करना होगा. ये चुनाव ऐसे समय में होंगे, जब देश परिसीमन की प्रक्रिया से गुज़र रहा होगा. लोकसभा और विधानसभा में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी आरक्षण लागू किया जा रहा होगा. ऐसे में नए अध्यक्ष को बदले हुए राजनीतिक माहौल के अनुरूप पार्टी को तैयार करना होगा.
  3. नितिन नबीन की पहचान संगठन के व्यक्ति के रूप में ही है और कहा जाता है कि बीजेपी अध्यक्ष बनने में उनकी इस पहचान की अहम भूमिका रही है. नितिन नबीन अपने पिता की मौत के बाद 2006 में पहली बार पटना पश्चिम से विधायक बने थे. तब नितिन ग्रेजुएशन की पढ़ाई कर रहे थे. यानी राजनीति में उनका आना अचानक ही हुआ था. लेकिन नितिन नबीन ने ख़ुद को साबित किया और पांचवीं बार विधायक बने. बिहार सरकार में अभी मंत्री भी हैं.

    विशेषज्ञ कहते हैं कि नितिन नबीन को संगठन के स्तर पर बड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है.”बीजेपी भी आलाकमान की पार्टी हो गई है. जब शक्ति का केंद्रीकरण होता है तो संगठन अपने अनुशासन के हिसाब से काम न करके आलाकमान के इशारों पर करता है. ऐसे में नितिन नबीन के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वह आलाकमान की सुनें या संगठन के अनुशासन को तवज्जो दें. अगर बीजेपी में संगठन मज़बूत हो जाएगा तो किसी एक की मुट्ठी में सारा नियंत्रण नहीं हो पाएगा.” वे कहते हैं कि बीजेपी की मशीनरी और संगठन बहुत व्यापक तो है ही लेकिन जटिलताएं भी हैं, ऐसे में नितिन नबीन के लिए संगठनों को दुरुस्त रखने की राह बहुत आसान नहीं होगी. नितिन नबीन के लिए सबसे मुश्किल है, दक्षिण भारत में संगठनों को मज़बूत करना.
  4. डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद वैश्विक परिस्थितियां तेज़ी से बदली हैं. भारत के पक्ष में बहुत चीज़ें नहीं हैं. भारत न चाहते हुए भी चीन से चीज़ें सामान्य कर रहा है. बीजेपी ने कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ चाइना (सीपीसी) के साथ अपना संवाद फिर से शुरू किया है, जो 2009 के बाद पहली बार हुआ है. इसी महीने एक चीनी प्रतिनिधिमंडल पार्टी नेताओं से मुलाक़ात के लिए दिल्ली स्थित बीजेपी मुख्यालय पहुंचा था. ट्रंप ने पहले से ही भारत के ख़िलाफ़ 50 फ़ीसदी टैरिफ़ लगा रखा है और ईरान से व्यापार करने पर 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने की घोषणा की है. ऐसे में सत्तारूढ़ दल होने के नाते बीजेपी इसे नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती. नए पार्टी अध्यक्ष के रूप में नितिन नबीन को भी इन वास्तविकताओं से दो चार होना पड़ेगा.
  5. 2027 और 2028 के चुनाव भी एक चुनौती रहेंगे। 2027 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव है, जबकि 2028 में मप्र, छग और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होंगे। ये चुनाव बेहद अहम रहेंगे, क्योंकि ये चारों बड़े राज्य हैं। लोकसभा में उप्र ने भाजपा को झटका दिया है, लेकिन अब   विधानसभा चुनाव है। इसपर भाजपा का फोकस है, इसलिए यह चुनाव चुनौतीपूर्ण रहेगा।

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