पीएम नरेंद्र मोदी से तमिलनाडु का नया टकराव शुरू हो गया है। तमिलनाडु के सीएम स्टालिन ने कहा है कि हिंदी ना तब, ना अभी और ना कभी। हिंदी के लिए तमिलनाडु में पहले भी कोई जगह नहीं थी, अभी भी नहीं है और आगे भी कभी नहीं होगी। दक्षिण मुख्यतः दो प्रमुख भाषाओं को महत्व देता है तमिल और अंग्रेजी। इसलिए हिंदी को लेकर तमिलनाडु का विवाद पुराना है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को भी तमिलनाडु सरकार ने इसी कारण लागू नहीं किया है।
Clashing with Modi, Tamil Nadu CM Stalin said: No to Hindi then, not now, and not ever.
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sandhyamidday@Newdelhi@ तमिलनाडु में भाषा के विवाद में फिर नया मोड़ ले लिया है। पीएम नरेंद्र मोदी और तमिलनाडु का टकराव इस मामले में एक बार फिर बढ़ जाएगा। वजह यह कि रविवार को तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालिन ने एक बार फिर हिंदी भाषा की खिलाफत को पुरजोर तरीके से दोहराया है।
मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के एक ताज़ा बयान ने तमिलनाडु में हिन्दी भाषा पर चल रही बहस को एक बार फिर हवा दे दी है.
रविवार को राज्य में सत्तारूढ़ डीएमके ने चेन्नई में ‘भाषा शहीद दिवस’ मनाया और इस मौके पर मुख्यमंत्री ने राज्य के उन ‘भाषा शहीदों’ को श्रद्धांजलि दी, जिनकी जान अतीत में ‘हिन्दी विरोधी आंदोलन’ के दौरान गई थी.
स्टालिन ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा, “न तब, न अभी, ना ही कभी हिन्दी को यहां जगह मिलेगी.”
हिन्दी को लेकर केंद्र की एनडीए सरकार और राज्य की डीएमके सरकार के बीच लंबे समय से तनातनी बनी हुई है, हालांकि इसकी जड़ें अतीत में रही हैं.
डीएमके अध्यक्ष स्टालिन कई बार आरोप लगा चुके हैं कि तमिलनाडु पर हिन्दी थोपने की कोशिश की जा रही है और वो इसका विरोध करना जारी रखेंगे.
हालांकि केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कुछ महीने पहले कहा था कि, “तमिलनाडु सरकार इस पर राजनीति कर रही है.”
उनका कहना था कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं को महत्व देने वाली है और इसमें कहीं भी ये नहीं कहा गया है कि हिन्दी की ही पढ़ाई जानी चाहिए.
रविवार को एक्स पर स्टालिन ने लिखा कि, “भाषा शहीद दिवस, गौरवशाली श्रद्धांजलि, हिन्दी के लिए कोई जगह नहीं है, न तब थी, न अब है और ना ही कभी होगी.”
उन्होंने आगे लिखा, “वह राज्य जो अपनी भाषा से अपनी जीवनधारा जैसा प्यार करता है, उसने एकजुट होकर हिन्दी थोपे जाने के ख़िलाफ़ संघर्ष किया. हर बार जब हिन्दी थोपी गई, उसने उसी बहादुरी के साथ प्रतिरोध किया.”
“उसने भारतीय उपमहाद्वीप में विविध भाषा-आधारित राष्ट्रों के अधिकारों और अस्मिता की रक्षा की. मैं उन शहीदों को हार्दिक श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ जिन्होंने तमिल (भाषा) के लिए अपने प्राणों की आहुति दी.”
“अब से भाषा संघर्ष में और कोई प्राण न खोए; हमारी तमिल चेतना कभी न बुझे! हम हिन्दी थोपे जाने का हमेशा विरोध करेंगे.”
उन्होंने हिन्दी विरोधी आंदोलन के इतिहास से जुड़ा एक छोटा वीडियो भी साझा किया, जिसमें अतीत में हुए आंदोलनों की रिपोर्टिंग की झलकियां और उसे नेतृत्व देने वाले नेताओं और प्रदर्शनकारियों की तस्वीरें दिखाई गई हैं.
वीडियो में ‘शहीदों’ के संदर्भ के साथ डीएमके के दिवंगत नेताओं सी एन अन्नादुरै और एम करुणानिधि के योगदान का भी जिक्र किया गया. यह आंदोलन 1965 में अपने चरम पर पहुंचा था.
तमिलनाडु में भाषा शहीद उन लोगों के संदर्भ में कहा जाता है जिनकी हिन्दी विरोधी आंदोलन के दौरान जान गई.
आज भी यह दक्षिणी राज्य दो भाषा फ़ॉर्मूला मानता है- तमिल और अंग्रेज़ी.
यह मामला तब फिर से उठा जब केंद्र ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लागू किया. तमिलनाडु सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति को राज्य में लागू नहीं किया है. डीएमके का आरोप है कि केंद्र इसके मार्फ़त हिन्दी थोपने की कोशिश कर रहा है.
वहीं केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा था कि तमिलनाडु सरकार इस पर ‘राजनीति’ कर रही है. उनका कहना है, “राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारतीय भाषाओं को महत्व देने वाली है और इसमें कहीं भी ये नहीं कहा गया है कि हिन्दी ही पढ़ाई जानी चाहिए.”

