Sandhyamidday@Newdelhi@ यूं तो अजब गजब हर कदम पर मिलते हैं, लेकिन आज हम बात करेंगे देश की कुछ ऐसी किताबें की , जो आई तो लोगों ने कहा कि अश्लील या सेक्सी है, लेकिन बाद में क्लासिक बन गई । सुप्रीम कोर्ट तक में माना गया कि इन किताबों में यथार्थ का चित्रण है। इसे साहित्य ही कहा जाएगा।
उस दौर में यह बहस छिड़ गई कि साहित्य की आज़ादी की सीमा कहाँ तक होनी चाहिए। हालांकि, यह विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ। लगभग 18 साल बाद, 1985 में, मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, जहाँ कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी रचना को उसके साहित्यिक उद्देश्य और सामाजिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ‘प्रजापति’ को अश्लील मानने से इनकार करते हुए सामरेश बसु को बरी कर दिया। यह फैसला भारतीय साहित्य और कानून के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि इसने यह स्पष्ट किया कि यथार्थ का चित्रण अपने आप में अश्लीलता नहीं है। ‘प्रजापति’ आज भी उस बहस की मिसाल है, जहाँ साहित्य, नैतिकता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता आमने-सामने खड़ी दिखती है।

‘लिहाफ़’ – इस्मत चुगताई
यह उर्दू साहित्य की सबसे चर्चित और विवादित कहानियों में गिनी जाती है। यह कहानी पहली बार 1942 में प्रकाशित हुई और इसके आते ही साहित्यिक और सामाजिक हलकों में हलचल मच गई। ‘लिहाफ़ में इस्मत चुगताई ने एक बंद कमरे की दुनिया के ज़रिए स्त्री अकेलेपन, दबी हुई इच्छाओं और वैवाहिक उपेक्षा को बेहद प्रतीकात्मक ढंग से दिखाया। कहानी में इस्तेमाल किए गए समलैंगिक संकेतों और यौन प्रतीकों को लेकर तत्कालीन रूढ़िवादी समाज ने इसे अश्लील करार दिया। खास तौर पर कहानी में “लिहाफ के हिलने” जैसे बिंबों को लेकर यह आरोप लगाया गया कि लेखिका ने स्त्री-स्त्री संबंधों की ओर इशारा किया है।
इसी आधार पर ब्रिटिश भारत में इस्मत चुगताई पर अश्लीलता का मुकदमा चला, जो उस दौर में किसी महिला लेखिका के लिए बेहद साहसिक और चुनौतीपूर्ण स्थिति थी। अदालत में इस्मत चुगताई ने स्पष्ट कहा कि कहानी में कहीं भी प्रत्यक्ष यौन दृश्य नहीं हैं, बल्कि यह पाठकों की मानसिकता पर निर्भर करता है कि वे इसे कैसे समझते हैं। लंबी बहस के बाद अदालत ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया। यह फैसला भारतीय साहित्य के इतिहास में एक मिसाल बन गया। आज ‘लिहाफ’ को अश्लील नहीं, बल्कि स्त्री अनुभव, दबे हुए यथार्थ और अभिव्यक्ति की आज़ादी की सशक्त कहानी माना जाता है, जिसने अपने समय से बहुत आगे की बात कही।
‘Lady Chatterley’s Lover’ – डी. एच. लॉरेंस
‘लेडी चैटरलीज़ लवर’ अंग्रेज़ लेखक डी. एच. लॉरेंस का चर्चित उपन्यास है, जिसे पहली बार 1928 में इटली में निजी रूप से प्रकाशित किया गया था। यह उपन्यास एक संभ्रांत महिला कॉनी चैटरली और उसके पति के नौकर ओलिवर मेलर्स के बीच प्रेम और शारीरिक संबंधों की कहानी कहता है। उस दौर में इस किताब में स्पष्ट यौन संबंधों, शारीरिक विवरण और अभद्र शब्दों के कारण इसे कई देशों में अश्लील माना गया। ब्रिटेन, अमेरिका और भारत जैसे देशों में इसके प्रकाशन और बिक्री पर रोक लगाने की कोशिशें हुईं।
भारत में यह मामला 1964 में “रंजीत डी. उदेशी बनाम महाराष्ट्र राज्य” केस के रूप में सामने आया, जब मुंबई के एक किताब विक्रेता पर IPC की धारा 292 (अश्लीलता) के तहत मुकदमा चला। सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि इस उपन्यास के कुछ अंश यौन उत्तेजना पैदा करने वाले हैं और समाज की नैतिकता को नुकसान पहुँचा सकते हैं, इसलिए इसे भारत में अश्लील माना गया। कोर्ट ने इस फैसले में ब्रिटिश कानून के Hicklin Test का सहारा लिया।
हालाँकि समर्थकों का कहना था कि यह किताब सिर्फ़ सेक्स नहीं, बल्कि मानवीय भावनाओं, वर्ग भेद और स्त्री की दबी इच्छाओं पर बात करती है। समय के साथ यह उपन्यास दुनिया भर में साहित्यिक क्लासिक माना जाने लगा, लेकिन भारत में यह लंबे समय तक अश्लीलता और अभिव्यक्ति की आज़ादी के बीच बहस का प्रतीक बना रहा।
‘हमज़ाद’ – मनोहर श्याम जोशी
‘हमज़ाद’ हिंदी साहित्य के चर्चित और बहस वाले उपन्यासों में गिना जाता है, जिसे प्रसिद्ध लेखक मनोहर श्याम जोशी ने लिखा। यह उपन्यास अपने समय से काफी आगे का माना गया, क्योंकि इसमें लेखक ने इंसान के अंधेरे मनोविज्ञान, अकेलेपन, असुरक्षा और दबे हुए यौन भावों को बेहद बेबाकी से सामने रखा। किताब के प्रकाशित होते ही साहित्यिक दुनिया में इसे लेकर तीखी प्रतिक्रियाएँ सामने आईं। उस दौर के कई पारंपरिक और नैतिकतावादी लेखकों व आलोचकों ने ‘हमज़ाद’ पर अश्लीलता, सेक्सुअल प्रतीकों के अनुचित प्रयोग और मानसिक विकृति को बढ़ावा देने जैसे आरोप लगाए। उनका कहना था कि उपन्यास में संबंधों और इच्छाओं को जरूरत से ज्यादा नंगा दिखाया गया है।
हालाँकि, लेखक के समर्थकों और आधुनिक सोच वाले पाठकों ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया। उनका मानना था कि ‘हमज़ाद’ कोई अश्लील कृति नहीं, बल्कि समाज की बनावटी नैतिकता को आईना दिखाने वाला उपन्यास है। यह किताब पाठक को भावनात्मक रूप से झकझोरती है, चौंकाती है और यह एहसास कराती है कि इंसान के भीतर छुपा अंधेरा कितना गहरा हो सकता है। मुख्य किरदार का मनोविश्लेषण इतनी गहराई से किया गया है कि पाठक उसके प्रति आकर्षण और डर दोनों एक साथ महसूस करता है।

