कांग्रेस का हमला: बजट में अर्थव्यवस्था की असली चुनौतियों से निपटने की कोई ठोस योजना नहीं
जयराम रमेश बोले- बजट में न निवेश की दिशा है, न रोजगार का भरोसा, आर्थिक सर्वे को किया गया नजरअंदाज
कांग्रेस ने बजट को गरीब और मध्यम वर्ग के लिए निराशाजनक बताया
Sandhyamidday@नई दिल्ली@कांग्रेस ने रविवार को पेश किए गए केंद्रीय बजट पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि यह बजट देश की आर्थिक जमीनी हकीकत से पूरी तरह कटा हुआ है। पूर्व वित्त मंत्री और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने कहा कि बजट न तो आर्थिक रणनीति की कसौटी पर खरा उतरता है और न ही आर्थिक नेतृत्व का कोई उदाहरण पेश करता है। उन्होंने कहा कि इस बजट में न विकास की कोई स्पष्ट दिशा है और न ही आम लोगों की समस्याओं का कोई ठोस समाधान।
कांग्रेस मुख्यालय में आयोजित पत्रकार वार्ता में पी. चिदंबरम के साथ पार्टी के संचार विभाग के प्रभारी महासचिव जयराम रमेश और संचार विभाग में रिसर्च व निगरानी प्रभारी अमिताभ दुबे ने आरोप लगाया कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने ही आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में चिन्हित चुनौतियों को बजट भाषण में पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने कहा कि सरकार ने शब्दों और नारों की बौछार तो की, लेकिन देश के सामने खड़ी बड़ी आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए बजट में कोई ठोस प्रावधान नहीं किया गया। कांग्रेस ने कहा कि यह बजट गरीब और मध्यम वर्ग के लिए निराशाजनक है।
पी. चिदंबरम ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था इस समय कम से कम दस गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है, जिनमें अमेरिकी टैरिफ का दबाव, वैश्विक व्यापारिक संघर्ष, चीन के साथ लगातार बढ़ता व्यापार घाटा, निजी निवेश में ठहराव, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को लेकर अनिश्चितता और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का लगातार बाहर जाना, ऊंचा राजकोषीय और राजस्व घाटा, वास्तविक महंगाई का बोझ, छोटे और मध्यम उद्योगों का बंद होना, युवाओं में बेरोजगारी और शहरी बुनियादी ढांचे की बदहाली शामिल है। उन्होंने कहा कि इनमें से किसी भी मुद्दे पर बजट भाषण में गंभीरता से बात नहीं की गई।
आंकड़ों का हवाला देकर चिदंबरम ने आरोप लगाया कि सरकार ने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे आम लोगों से जुड़े क्षेत्रों के बजट में भारी कटौती की है। उन्होंने बताया कि ग्रामीण विकास में 53,067 करोड़ रुपये और शहरी विकास में 39,573 करोड़ रुपये की कटौती की गई है। शिक्षा क्षेत्र में 6,701 करोड़ रुपये, स्वास्थ्य में 3,686 करोड़ रुपये और कृषि क्षेत्र के आवंटन में 6,985 करोड़ रुपये की कटौती हुई है।
उन्होंने जल जीवन मिशन का जिक्र करते हुए कहा कि जिस योजना का बड़े पैमाने पर प्रचार किया गया, उसका बजट 67,000 करोड़ रुपये से घटाकर महज 17,000 करोड़ रुपये कर दिया गया। बाद में 2026-27 के बजट में इसे बढ़ाकर 67,670 करोड़ रुपये कर दिया गया है। चिदंबरम ने कहा कि पहले इतनी बड़ी कटौती और फिर आवंटन बढ़ाने से ऐसे आंकड़ों की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
पूर्व वित्त मंत्री ने 2025-26 के वित्त प्रबंधन को बेहद खराब बताते हुए कहा कि राजस्व प्राप्तियां 78,086 करोड़ रुपये कम रहीं और कुल व्यय 1,00,503 करोड़ रुपये कम रहा। उन्होंने बताया कि राजस्व व्यय 75,168 करोड़ रुपये कम हुआ और पूंजीगत व्यय में 1,44,376 करोड़ रुपये की कटौती की गई। इसमें केंद्र के पूंजीगत व्यय में 25,335 करोड़ रुपये और राज्यों के पूंजीगत व्यय में 1,19,041 करोड़ रुपये की कटौती शामिल है। उन्होंने कहा कि बजट में इस कमजोर प्रदर्शन की कोई व्याख्या तक नहीं की गई।
चिदंबरम ने कहा कि केंद्र का पूंजीगत व्यय 2024-25 में जीडीपी के 3.2 प्रतिशत से घटकर 2025-26 में 3.1 प्रतिशत रह गया है। उन्होंने बताया कि कई महीनों की कवायद के बाद भी राजकोषीय घाटा 4.4 प्रतिशत पर ही अटका हुआ है और 2026-27 में इसके सिर्फ 0.1 प्रतिशत घटकर 4.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। राजस्व घाटा 1.5 प्रतिशत पर स्थिर रहने वाला है। उन्होंने कहा कि यह वित्तीय अनुशासन और समेकन की दिशा में कोई साहसिक कदम नहीं है।
आयकर से जुड़े प्रावधानों पर चिदंबरम ने कहा कि देश की बड़ी आबादी का आयकर से कोई सीधा सरोकार नहीं है, इसलिए छोटे-मोटे बदलाव आम लोगों के जीवन पर कोई खास असर नहीं डालते।
बजट भाषण की शैली पर टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि वित्त मंत्री ने योजनाओं, मिशनों, फंडों, हब्स और समितियों की संख्या बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दिया। चिदंबरम ने कहा कि उन्होंने कम से कम 24 ऐसे नए कार्यक्रमों की गिनती की है और आशंका जताई कि इनमें से कई अगले साल तक भुला दिए जाएंगे।
चिदंबरम ने घरेलू वित्तीय हालात पर भी गंभीर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि हालिया घरेलू सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि देश में घरेलू बचत लगातार घट रही है, जबकि घरेलू कर्ज बढ़कर अब लगभग 51.7 प्रतिशत तक पहुंच गया है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब घरों की बचत कम होगी और कर्ज बढ़ेगा, तो निवेश की क्षमता कैसे बनेगी। चिदंबरम ने कहा कि हैरानी की बात है कि वित्त मंत्री ने बजट भाषण में घरेलू बचत और घरेलू कर्ज के इन दोनों अहम आंकड़ों का एक बार भी ज़िक्र नहीं किया, जबकि यही देश की आर्थिक हकीकत को समझने की बुनियाद है।
रोजगार के मुद्दे पर सरकार के दावों को खारिज करते हुए चिदंबरम ने पिछले साल की बजट घोषणा का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि पीएम इंटर्नशिप योजना के तहत 1.65 लाख ऑफर दिए गए थे, लेकिन इनमें से सिर्फ करीब 20 प्रतिशत युवाओं ने ही इन्हें स्वीकार किया। स्वीकार करने वालों में से भी लगभग 6,000 युवाओं ने बीच में ही योजना छोड़ दी। चिदंबरम ने सवाल किया कि जब पिछले साल की योजनाओं का यह हाल है, तो सरकार यह कैसे बताएगी कि इस बजट से युवाओं के लिए वास्तविक रोजगार कहां और कैसे पैदा होंगे।
जयराम रमेश ने कहा कि यह बजट न तो निवेश को बढ़ावा देने की कोई ठोस दिशा देता है और न ही युवाओं को रोजगार का भरोसा देता है। उन्होंने कहा कि अगर सरकार ने आर्थिक सर्वे को गंभीरता से पढ़ा होता, तो देश की वास्तविक आर्थिक चुनौतियां बजट में जरूर दिखतीं।

