Madhya Pradesh Higher Education Minister Inder Singh said, Raja Rammohan Roy was a British agent.
फेसबुक पर वीडियो में कथित रूप से यह बयान देते हुए दिख रहे हैं परमार
नईदिल्ली@sandhyamidday@ मध्य प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार ने राजा राममोहन राय को लेकर विवादित बयान दिया है। इंदर सिंह परमार ने कथित रूप से कहा है कि राजा राममोहन राय अंग्रेजों के दलाल थे।
कांग्रेस नेता और डाटा एनालिटिक्स-इंफ्लुअर्स अपूर्व भारद्वाज ने इंदर सिंह परमार का इस तरह का बयान देता हुआ वीडियो अपने फेसबुक अकाउंट पर शेयर किया है। sandhyamidday.com इस वीडियो की कोई पुष्टि नहीं करता है। अपूर्व द्वारा पोस्ट इस वीडियो में परमार ने एक कार्यक्रम में मंच से भाषण देते हुए कहा कि अंग्रेजों ने उस समय बहुत सारे फर्जी समाज सुधारक खड़े कर रखे थे, उनमें ही एक राजा राममोहन राय भी थे। असली समाज सुधारक बिरसा मुंडा थे। यह बड़ी बात है कि देश में इस समय तीन महापुरुषों का 150 शताब्दी वर्ष मना रहे हैं। एक बिरसा मुंडा, दूसरा सरदार वल्लभ भाई पटेल और तीसरा वंदे मातरम।
गौरतलब है कि राजा राममोहन राय को देश में बड़ा समाज सुधारक माना जाता है। सती प्रथा के विरुद्ध उनके समाज सुधार को दशकों से कोर्स में भी पढ़ाया जा रहा है।
sandhyamidday.com इस वीडियो की पुष्टि नहीं करता है, सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट का लिंक खबर के अंत में दिया गया है।

एक नजर में राजा राम मोहन राय
राजा राम मोहन राय आधुनिक भारत के पुनर्जागरण के जनक और एक अथक समाज सुधारक माने जाते हैं, जिन्होंने भारत में ज्ञानोदय एवं उदार सुधारवादी आधुनिकीकरण के युग की शुरुआत की। राजा राम मोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 को बंगाल के राधानगर में एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
राजा राम मोहन राय का जन्म 22 मई, 1772 को बंगाल के राधानगर में एक रूढ़िवादी ब्राह्मण परिवार में हुआ था।
राजा राम मोहन राय की प्रारंभिक शिक्षा फारसी और अरबी भाषाओं में पटना में हुई, जहाँ उन्होंने कुरान, सूफी रहस्यवादी कवियों की रचनाओं तथा प्लेटो एवं अरस्तू की पुस्तकों के अरबी संस्करण का अध्ययन किया।
बनारस में उन्होंने संस्कृत भाषा, वेद और उपनिषद का भी अध्ययन किया।
वर्ष 1803 से 1814 तक उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी के लिये वुडफोर्ड और डिग्बी के अंतर्गत निजी दीवान के रूप में काम किया।
वर्ष 1814 में उन्होंने नौकरी से इस्तीफा दे दिया और अपने जीवन को धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक सुधारों के प्रति समर्पित करने के लिये कलकत्ता चले गए।
नवंबर 1830 में वे सती प्रथा संबंधी अधिनियम पर प्रतिबंध लगाने से उत्पन्न संभावित अशांति का प्रतिकार करने के उद्देश्य से इंग्लैंड चले गए।
राम मोहन राय दिल्ली के मुगल सम्राट अकबर की पेंशन से संबंधित शिकायतों हेतु इंग्लैंड गए तभी अकबर द्वारा उन्हें ‘राजा’ की उपाधि दी गई।
अपने संबोधन में टैगोर ने राम मोहन राय को भारत में आधुनिक युग के उद्घाटनकर्त्ता के रूप में भारतीय इतिहास का एक चमकदार सितारा कहा।
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