नरोत्तम के सियासी भविष्य पर भी सवाल, हाशिये पर जाएंगे या लौटेंगे
http://Questions surround Narottam’s political future too—will he be sidelined or make a comeback?
दिल्ली दौरे के बाद साफ संकेत- संगठन के साथ रहेंगे, लेकिन आगे की भूमिका पर सबकी नजर
जब मध्य प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा चुनाव हारे थे, तो उन्होंने पूरी दबंगई से एक शेर कहा था कि
मेरा पानी उतरा हुआ देख किनारे पर घर मत बना लेना,
मैं समंदर हूं लौट कर आऊंगा…!
अब जब उनका टिकट कट गया, तो उनसे मीडिया ने इस शेर पर फिर प्रतिक्रिया मांगी। हर विपरीत सवाल पर भी जवाब देने वाले नरोत्तम ने फिर मुस्कुरा कर कहा- अब किनारे पर आराम से घर बना लेना…. ! नरोत्तम का यह बयान फिर लंबे अरसे तक याद रखने वाला है। नरोत्तम मिश्रा वापस सत्ता में किसी मोर्चे पर वापसी करेंगे या हाशिये पर जाकर खो जाएंगे, यह उनके अस्तित्व का सवाल बन गया है। पढ़िए, इस पर उनकी दिल्ली यात्रा और सियासत को लेकर स्टोरी।
sandhyamidday@नई दिल्ली। दतिया उपचुनाव का टिकट नहीं मिलने के बाद पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने जिस तरह दिल्ली जाकर पार्टी नेतृत्व के सामने अपना पक्ष रखा और फिर सार्वजनिक रूप से कहा कि “पार्टी से बड़ा कोई नहीं होता”, उससे तत्काल टकराव की अटकलों पर विराम लग गया है। लेकिन, बड़ा सवाल अब यह है कि भाजपा में नरोत्तम मिश्रा की अगली राजनीतिक भूमिका क्या होगी। कोई भूमिका होगी भी या नहीं..?
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि फिलहाल पार्टी का पूरा फोकस दतिया उपचुनाव जीतने पर है। ऐसे में संगठन नहीं चाहता कि टिकट विवाद लंबा खिंचे। इसी वजह से पार्टी ने नरोत्तम मिश्रा से अधिकृत प्रत्याशी आशुतोष तिवारी के समर्थन में सक्रिय रहने का संदेश दिया है। वहीं, टिकट नहीं मिलने के बाद दतिया में उनके समर्थकों के विरोध प्रदर्शन ने यह भी दिखाया कि क्षेत्र में उनकी राजनीतिक पकड़ अभी भी मजबूत है।
आगे क्या हो सकता है?
भाजपा के भीतर नरोत्तम मिश्रा जैसे अनुभवी नेताओं को पूरी तरह हाशिये पर रखना आसान नहीं। वजह यह की तमाम अहंकार भरे व्यवहार के बावजूद उनके जैसे जिंदादिल और तजुर्बेकर अनुभव वाले नेता भाजपा के पास काम ही है। ऐसे में उनके सामने कई संभावित विकल्प दिखाई देते हैं।
पहला, यदि वे दतिया उपचुनाव में पूरी सक्रियता से पार्टी प्रत्याशी को जिताने में सफल रहते हैं तो संगठन में उनका राजनीतिक कद बरकरार रह सकता है और भविष्य में उन्हें प्रदेश या राष्ट्रीय संगठन में अहम जिम्मेदारी मिल सकती है। लेकिन, इसके साथ खतरा यह भी कि दतिया में आशुतोष तिवारी की जीत के साथ नरोत्तम का पावर शिफ्ट हो जाएगा। यदि आशुतोष हारते हैं तो नरोत्तम की वापसी किसी न किसी रूप में वापस उनकी बोई-रोपी जमीन पर होने के आसार रहेंगे।
दूसरा, भाजपा 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी अभी से शुरू कर रही है। ऐसे में नरोत्तम मिश्रा को चुनाव प्रबंधन, संगठन विस्तार या किसी महत्वपूर्ण रणनीतिक भूमिका में लगाया जा सकता है। इसमें फिर यह खतरा है कि सत्ता और संगठन दोनों में पीढ़ी परिवर्तन हो रहा है। ऐसे में नरोत्तम के कद के नेता को किसी जगह पर खपाना आसान नहीं होगा। नरोत्तम खुद के लिए दूसरे नेताओं से समन्वय करके चलना आसान काम नहीं। प्रदेशसंगठन में उनका सियासी कद प्रदेश अध्यक्ष से भी बड़ा है, इसलिए यह रास्ता भी आसान नहीं।
तीसरा, यदि आने वाले समय में केंद्र या संगठन में कोई रिक्ति बनती है तो उनके लंबे अनुभव का उपयोग राज्यसभा, संगठन या किसी अन्य दायित्व में भी किया जा सकता है। हालांकि इस संबंध में अभी तक पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक संकेत नहीं है। नरोत्तम के लिए भविष्य की राह राज्यसभा या लोकसभा उम्मीदवारी हो सकती है, लेकिन जब पीढ़ी परिवर्तन का दौर चल रहा है तो वहां भी जगह बनाना आसान नहीं। पिछले लोकसभा और फिर विधानसभा दोनों जगह उनका नंबर नहीं लगा। ऐसे में आने वाले समय में भी उनका नंबर आसान नहीं है।
सियासी भविष्य
नकारात्मक संकेत: दतिया से टिकट कटना उनके लिए बड़ा राजनीतिक झटका है। 2023 में विधानसभा चुनाव हारने के बाद यह दूसरा बड़ा झटका माना जा रहा है।
सकारात्मक संकेत: उन्होंने पार्टी के फैसले का विरोध नहीं किया, बल्कि अनुशासन का संदेश दिया। इससे उनके संगठन में बने रहने की संभावना मजबूत होती है।
भाजपा की कार्यशैली: भाजपा अक्सर वरिष्ठ नेताओं को चुनावी राजनीति से हटाकर संगठन, राष्ट्रीय जिम्मेदारी, राज्यसभा, बोर्ड-निगम या रणनीतिक भूमिकाओं में भी अवसर देती रही है। इसलिए टिकट कटना हमेशा राजनीतिक अंत नहीं होता।
दतिया ही तय करेगा भविष्य
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नरोत्तम मिश्रा का भविष्य काफी हद तक दतिया उपचुनाव के नतीजे और उसमें उनकी भूमिका पर निर्भर करेगा। यदि उनके समर्थक पूरी तरह भाजपा के साथ खड़े होते हैं और पार्टी जीत दर्ज करती है तो यह संदेश जाएगा कि मिश्रा ने संगठन को प्राथमिकता दी। वहीं यदि असंतोष बना रहता है तो दतिया का घटनाक्रम भाजपा के लिए चुनौती बन सकता है।
दिल्ली दौरे का संदेश
दिल्ली जाकर शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात और उसके बाद संयमित बयान देना इस बात का संकेत है कि नरोत्तम मिश्रा फिलहाल पार्टी के भीतर रहकर ही अपनी राजनीतिक भूमिका तलाशना चाहते हैं। भाजपा नेतृत्व भी सार्वजनिक टकराव से बचते हुए वरिष्ठ नेताओं को साथ लेकर चलने की रणनीति पर काम करता दिखाई दे रहा है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि नरोत्तम मिश्रा ने बगावत का रास्ता नहीं चुना है। अब उनकी अगली राजनीतिक पारी इस बात पर निर्भर करेगी कि वे संगठन के लिए कितने उपयोगी साबित होते हैं और भाजपा नेतृत्व उन्हें किस भूमिका में आगे बढ़ाता है।

