http://Gadkari lashes out at those seeking election tickets based on caste, says: “If they get a ticket, they’ll stake a claim for their wife and son too.”
नागपुर में चर्मकार सेवा संघ के कार्यक्रम
गडकरी ने कहा कि उनका 40-50 साल का राजनीतिक अनुभव बताता है कि केवल जाति के आधार पर किसी व्यक्ति को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने से समुदाय का विकास सुनिश्चित नहीं होता। उन्होंने टिकट मिलने के बाद परिवार के अन्य सदस्यों के लिए टिकट मांगने की प्रवृत्ति पर भी टिप्पणी की। उनके मुताबिक पहले व्यक्ति के लिए टिकट मांगा जाता है, फिर पत्नी, बेटे और बेटी के लिए और आगे निजी सहायक तक के लिए टिकट की मांग होने लगती है।
‘समाज के नाम पर टिकट, फिर परिवार की बारी’
गडकरी की टिप्पणी का एक बड़ा हिस्सा राजनीति में जातीय प्रतिनिधित्व के साथ परिवारवाद की प्रवृत्ति पर केंद्रित रहा। उनका कहना था कि पार्टी से किसी व्यक्ति को टिकट मिलने के बाद अपेक्षा होती है कि वह अपने समुदाय और क्षेत्र के विकास के लिए काम करेगा। लेकिन उनके अनुभव में कई मामलों में टिकट मिलने के बाद राजनीतिक दायरा समाज से परिवार तक सिमट जाता है।
यही वजह है कि गडकरी ने राजनीतिक प्रतिनिधित्व को केवल जातीय पहचान से जोड़ने के बजाय व्यक्ति के काम, शिक्षा, क्षमता और समाज के प्रति योगदान से जोड़ने की बात कही।
जाति के बजाय शिक्षा और कौशल पर जोर
गडकरी चर्मकार समाज के कार्यक्रम में बोल रहे थे, इसलिए उनकी टिप्पणी का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू सामाजिक विकास से जुड़ा रहा। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज की प्रगति शिक्षा पर निर्भर करती है। रोजगार की समस्या का समाधान शिक्षा और कौशल से हो सकता है तथा इससे समाज के लोगों को अलग-अलग क्षेत्रों में सम्मान और मुख्यधारा में जगह मिलती है। उन्होंने यह भी कहा कि शिक्षा का मतलब केवल डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार या वकील बनना नहीं है। अलग-अलग क्षेत्रों में उपयोगी ज्ञान और कौशल हासिल करना भी जरूरी है। कार्यक्रम में उन्होंने युवाओं को रोजगारोन्मुख शिक्षा और कौशल विकास पर ध्यान देने का संदेश दिया।
सितंबर में दूसरी बार जाति की राजनीति पर गडकरी का संदेश
गडकरी का यह बयान ऐसे समय आया है जब वह इसी महीने नागपुर में जाति आधारित राजनीति को लेकर अपना रुख पहले भी स्पष्ट कर चुके हैं। 5 सितंबर को आईआईएम नागपुर के मीडिया कॉन्क्लेव में उन्होंने जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक मुद्दों के आधार पर मतदान की बात कही थी। उन्होंने अपने राजनीतिक अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा था कि अलग-अलग जातियों के लिए बनाए गए राजनीतिक प्रकोष्ठों का प्रयोग उनके लिए भी समस्या का कारण बना और उन्हें अपेक्षित राजनीतिक लाभ नहीं मिला।
राजनीति में संदेश क्या?
गडकरी की ताजा टिप्पणी को तीन स्तरों पर देखा जा सकता है—
पहला—टिकट का आधार: जाति की पहचान के साथ-साथ उम्मीदवार के काम और सामाजिक योगदान को महत्व देने की बात।
दूसरा—परिवारवाद: एक व्यक्ति को टिकट मिलने के बाद परिवार के अन्य सदस्यों के लिए लगातार राजनीतिक टिकट मांगने की प्रवृत्ति पर सवाल।
तीसरा—समाज का विकास: राजनीतिक पद और प्रतिनिधित्व के बजाय शिक्षा, रोजगार और कौशल को सामाजिक उत्थान का आधार बनाने पर जोर।

